बात उस समय की है जब मैं 8 या 9 साल का था । चुकी मैं युगपुरुष केजरीवाल की तरह उच्च कोटि की स्मरण शक्ति नही रखता इसलिए 8 या 9 साल ही लिखूंगा । हर बच्चे की तरह मेने भी साइकिल की जिद्द की । चुकी पिताजी एक साधारण पत्रकार थे तो अपने एक मात्र पुत्र के साइकिल की कामना के लिए भी उन्हें 6 महीने से भी ज्यादा सोचना पड़ा । "इम्तेहान मैं अच्छे अंक ले आओगे तो साइकिल आएगी " , "टिंडे खाओगे तो साइकिल आएगी " ऐसी बातें इन 6 महीनो के दौरान बहुत ही आम हो चुकी थी । इम्तेहान में अच्छे अंक लाकर और टिंडे खा कर मैने अपनी इमानदारी का परिचय दिया । अब पिताश्री की बारी थी अपनी बात रखने की ।
अगस्त में जन्मदिन के उपहार में मुझे मिली मेरे जीवन की पहली साइकिल । लाल और बैंगनी रंग की चार पहिये वाली साइकिल । मै और मेरी बहन बारी बारी से उस साइकिल को चलाते थे । कई बार लड़ाई भी होती थी ।
मगर मै उस साइकिल से ज्यादा दिन खुश न रह पाया क्यूंकि मेरे ज्यादातर दोस्तों पे पास ATLAS की बड़ी वाली साइकिल थी । अब मेरी बहन को भरपूर समय मिलने लगा साइकिल पर । वो नकचड़ी तो थी मगर मेरे कलेजे का टुकड़ा भी थी । उससे की हर लड़ाई आज भी मुझे याद है । उससे लड़ाई करना और फिर उसे प्यार से मनाना , और उसका मेरे किसी खिलौने के व्यापार पे ही मानना आज भी एक हसीं याद बन कर मेरे जेहेन में है ।
ख़ैर अब आते हैं साइकिल पर । चूँकि मैने इतनी मशक्कत के बाद ये साइकिल पाई थी तो मै फिरसे अपने परिवार वालो को परेशान नही करना चाहता था । उचित येही समझा कि अब चुप रहने में ही भलाई है।
उस दौरान पिताजी के पास एक दुपहिया वाहन हुआ करता था "बजाज कवाशाकी" CT100 । उसी पर मेरा और मेरी बहन का स्कूल आना जाना हो जाया करता था पिताजी की मदद से । इम्तेहान अभी दूर थे और रविवार को शक्तिमान के साथ मेरी दोपहर मुझे छोटी छोटी मगर मोटी बातें सिखाने लगी थी । सब कुछ ठीक था । अब साइकिल का ख्याल भी मन से निकल चूका था । नवम्बर सामने था और बाल मेल की त्य्कारी जोरो पे थी । तभी एक रोज़ मेरी बहन के क्लास से एक बच्चा आया और कहने लगा "जल्दी चल तेरी बहन को पेट में दर्द हो रहा है , मास्टर साहब बुला रहे हैं । " अब मै कौनसा डॉक्टर था जो मुझे मास्टर ने बुलाया था । ये सवाल आज भी खुदसे पूछता हूँ । ख़ैर पिताजी भी आ चुके थे । हॉस्पिटल जा कर पता लगा प्यारी बहना को Appendix के ऑपरेशन की जरुरत है और उसी वाक्टी 26 हज़ार रूपए चाहिए थे । पिताजी ने आओ देखा न तो अपनी मोटर साइकिल बेच दी । प्यारी बहना का ऑपरेशन हुआ और दर्द से उसे रहत मिली बस पेट पे एक कभी न जाने वाला निशान मिल गया ।
अब स्कूल जाने के लिए हम अपने दोस्तों के साथ जाते 4
थे । ऑपरेशन के वजेह से प्यारी बहना को यूँ पैदल चलने पर मजबूर करना हमारी मज़बूरी थी । तभी पिताजी ने एक साइकिल खरीदी खुद के लिए , और वो भी ATLAS। अब प्यारी बहना साइकिल के कार्रिएर पे बैठ के स्कूल जाती और मै राजा की तरह चल कर । कुछ दिनों बाद मैने भी बड़ी साइकिल को कैची बना के सिख लिया । और प्यारी बहना के साथ खूब घुमाई करने लगा । उसके बाद मैने ठीक से साइकिल चलानी
सीख गया और अगले 4 साल तक हम स्कूल ऐसे ही गए । पिताजी की माली हालत ठीक हो जाने पे प्यारी बहना को भी एक अलग साइकिल मील गई । दोनों साइकिल पे स्कूल जाने लगे और दशवी तक इसे ही गए |
आज इस पोस्ट के पीछे इस तस्वीर का हाथ है । जिसने पुराणी बातें फिरसे नयी करदी । :)
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