Saturday, 25 July 2015

Man kidnaps a voiceless girl after watching Bajrangi Bhaijaan

A new report is coming from LOC, that a man named Zeeshan Khan, who owns a puncture garage in Meerut UP, tried to cross the LOC with a 5 year old voiceless girl. He was caught while trespassing the Indian side of LOC. When the Army personnel interrogated him he confessed watching Bajrangi Bhaijaan and his move was to copy Bhai so that he can bring better relationship between Indian and Pakistanis.



When he saw the innocent girl wearing flimsy cloth he realized this girl must be from Pakistan. He went to local Bajrang Bali temple and offered Namaj there. He was later thrashed by VHP activists. Then he went to local meat shop, bought some chicken and made some Biryani thinking the girl will not eat vegetables as she is a Pakistani. But the girl refused. He sold his puncture shop and came with the girl to cross the border but before he can do a BHAI he was caught by Indian Army.

Meanwhile Kashmiri separatists were seen throwing stones at army showing there protest against Zeeshan's arrest and MIM Mr Ojhazi said Zeeshan is being targated because of his religion, had he been a Hindu Brahmin no one would have caught him.

By the time this report is being written army have received information that from the Uttar Pradesh police that the girl who was found with Zeeshan Khan was kidnapped by him and she is daughter of a local resident. The officer who sent the information and written the report was dismissed by Akhilesh Yadav as he was a threat to the communal harmony of Uttar Pradesh.

After all these protests Army is sending the girl back to Meerut to her parents. Zeeshan was sent to Agra asylum for treatment.
 


Saturday, 6 June 2015

दिल में एक आग है |

आज बड़े दिनों बाद थोड़ी फुर्सत मिली | और इन फुर्सत के कुछ पलों में खुद को मै मिला | इस जीवन  में  कितना भागा  दौड़ी  है ? हर किसी को देखो तो बस भागता रहता है |

२०१० में मेरा आगमन दिल्ली में हुआ | मुख़र्जी नगर में मेरे कोई परिचित पिछले ३ वर्षो से सिविल सेवा परीक्षा की तैय्यारी में लगे हुए थे | उन्होंने ही मुझे छत दी थी | मै सदा कृतग्य रहूँगा उनके इस आचरण के लिए | मेरे दिल्ली विश्विद्यालय में दाखिला भी उनके ही मार्गदर्शन से हुआ था | ख़ैर दाखिला कैसे हुआ और क्यों हुआ ये कभी इत्मीनान से बताऊंगा | आज दिल्ली के विषय में कुछ कहना चाहता हूँ |

दिल्ली , कहते हैं ये दिलवालो का शहर है | दिल छोडिये साहब  यहाँ  पर तो लोगो के अन्दर आत्मा भी नहीं है | मेरे जैसे मिडिल क्लास के लौंडे जो आँखों में बड़े सपने, कंधो पे परिवार की अपेक्षाएं , पर्स में बाबूजी का खेत बेच के दिया पैसा और बैग में माँ का दिया ठेकुआ और निमकी ले कर आनंद विहार स्टेशन ( पूर्वांचल से आने वाली ज्यादातर गाड़ियाँ नई दिल्ली के बजाए आनन्द विहार स्टेशन पे आती हैं ) पर हर साल मई  / जून में उतरते हैं | फ़ोन पे मै सब सम्भाल लूँगा कहने वाला दोस्त दिल्ली आगमन पे टोन बदल लेता है | उसका अपना आलिशान फ्लैट जो हमरे घर के रसोई से भी छोटा है वो किराए का निकलता है | जल्द ही हमे सर छुपाने के लिए कोई जगह चाहिए होती है | जब मन में ये सवाल सताता है की कहा रहे तो सामने नज़र आता है "कमरे ही कमरे" का बोर्ड | अन्दर मिलते हैं कोई चौधरी साहब, जिनके गले में गाय को बाँधने वाले रस्सी की जितनी मोटी  सोने की चैन होती है और गाडी के पीछे लिखा होता "जाट बॉय" | उनका काम होता है हमारे जैसे लौंडो को कमरा दिलाना और दलाली खाना | वो अक्सर हमे सस्ते में कमरा दिलाने के नाम पे १५०० वाला कमरा ३००० में दिलवाते हैं ताकि दलाली ज्यादा मिले | मकानमालकिन भी खुश  रहति  है क्यूंकि उसे भी ज्यादा किराया मिल रहा है | अब दिल्ली में हर कोई किसी न किसी की काटता है और किसी न किसी का कटता भी है |दम घुटा देने वाला छोटा सा कमरे जहां पे पीने का पानी भी खरीदना होता है | वजीराबाद के किसी हैंडपंप के पानी को बिसलेरी बता कर दध्ले से बेचा जाता है | घर पे जो एक वक़्त का बना खाना दुसरे वक़्त माँ दे देती थी तो हम कह देते थे ये बासी है , यहाँ दोपहर में बना खाना शाम को फ्रेश बता कर गंदी टिफ़िन में भेजा जाता है | चाय के नाम पे मीठा गर्म पानी भी मिलता है |

कॉलेज शुरु होने पे अक्सर कन्वर्सेशन तब खत्म हो जाती है जब साथी पूछते हैं तुम कहाँ से हो ? अब क्या बताए की कहाँ से है ? हमारा जन्म अविभाजित बिहार में हुआ था , झारखण्ड में हम गंगा उस पार के थे तो बिहार में गंगा उस पार के |  दादा जी के पास UP जाते तो वहां हमको फिरसे बिहारी कह दिया जाता | नानी के गाँव में हमसे इस लिए नफरत की जाई थी क्यूंकि हमलोग ब्राह्मण थे | साला हमको तो समझे में नहीं आता था की लोगो का प्रॉब्लम का था ? साला कोई भी स्टेट हमको एक्सेप्ट पे नहीं कर रहा था | थोडा एनालिसिस कर के कह दिए जी रांची से हूँ , तो सामने से आवाज आती ये कहाँ है ? फिर हम जवाब देते आप रांची नहीं जानते ? धोनी वहीँ से है | धोनी भैया बहुत इज्जत बचाय हैं भाई | उनके नाम के सहारे दो मिनट कोई रुक जाता था हमसे बात करने लेकिन जैसे ही उसको कोई ये बताता की रांची झारखण्ड में है वो ससुरा हमको बिहारी बोल के हंस देता था | बिहारी बोला चलो पूरा पूर्वांचल को जोड दिया मगर उस हंसी के पीछे की सच्चाई बाद में पता लगा हमको  | अब डेली का एक डोज हो गया था हमरे तिरस्स्कार | कभी कोई हमको बिहारी कहता तो कभी चावल खाने वाला | मने उनलोग को रिक्शा चलाने वाला और हममें कोई फर्क नही नज़र आता था | कभी कभी कुछ लोग हमसे बे बात उलझते थे | ख़ैर हमने पढाई में मन लगाया | दिल्ली विश्वविद्यालय में पढने वालो की कद्र होती है | हमारे प्रोफेस्सोर्स काफी मदद किये हमारा | मगर वहां भी कुछ लोग एंटी बिहारी सिन्द्रोंम में ग्रसित थे | हम सेमेस्टर सिस्टम के पहले बैच में थे | पहला सेमेस्टर में यूनिवर्सिटी में पहला स्थान आ गया | अब उगते सूरज को हर कोई प्रणाम करता है | फिर हमारे फेसबुक पे फ्रेंड रिक्वेस्ट का भरमार हो गया | लोग ऐसे थे जो रात भर फच्बूक पे बात करते थे मगर सामने ऐसे रहते थे जैसे जानते ही नही | कॉलेज में हमेशा लोगो से घिरे तो रहे मगरथे बिकुल अकेले ही | गिर्ल्फ़्रिएन्द्स भी बहुत बनाए, टिउसन से कमाया पैसा उनलोगों पे बहुत उदाए मगर वो सब कुछ कांफोर्मिटी के लिए किया गया | अकेलापन कभी खत्म नहीं हुआ | यूनिवर्सिटी के एक आयोजन में दुसरे कॉलेज के टोपरो से भी मुलाक़ात हुई | उनसे दोस्ती का आलम य हुआ की एक हाथ में जाम तो दुसरे में जॉइंट पकड़ा दी गई |

बाकी अगले पोस्ट में