Tuesday, 11 November 2014

राम कि शक्ति पूजा - नाटक क्या देखा क्या समझा ।

राम की शक्ति पूजा ... वैसे तो आज इस नृत्य नाटक और यूँ कहें नृत्यनाट्य रामलीला को देखने का शुभ अवसर हमारे स्कूल के मित्र और सहपाठी श्री राहुल श्रीवास्तव जी के कारन हो पाया । उन्होंने हमें सुबह दस बजे THE HINDU अख़बार की एक कटिंग वेत्सप्प पे भेजी और कहा "चुप चाप आ जइयो " । मित्र की बात टालने की हिम्मत हमारी तो न हो पाई । हमने भी काम पुररकिया और निकल लिए । सच कहूँ तो मैंने निराला जी की कविता पढ़ी नही थी मगर इस नाटक को देखने के बाद मुझे उनकी रचनाओ में और भी दिलचस्पी आई है । इस नाटक को दिखने का मूल उद्देश् निराला के साहित्यिक कार्यो को हिंदी पाठको तक पहुचना था जिसमे आयोजक बहुत हद तक सफल हुए हैं । मैं उनका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ ।

अब आपको कुछ इस नाटक के बारे में बताता हूँ । मैं ना केवल इस नाटक का वर्णन अपने शब्दों में करूँगा किन्तु मैंने खुद को और इस आधुनकि युग के जिस प्रकार से इस नाटक के माध्यम से देखा है उसका भी वर्णन करूँगा । इस नाटक में दिखाया गया है कैसे प्रभु राम रावण से युद्ध करते वक़्त अवसादग्रस्त हो कर निराशा के चरम सीमा पे चले जातें हैं । उन्हें लगता है शक्ति रावण के साथ हैं और वो रावण से कभी विजय नही प्राप्त कर पाएंगे । राम को सीता कि याद खाए जा रही है । प्रियतमा कि कुसलमंगल होने की कामना उन्हें अवसादग्रसित बना रही है । तब विभीषण उन्हें धिकारते हैं के विजय के इतने करीब आकर वो कैसे यूँ हताश हो सकते हैं ? इन सब के बीच जामवंत बुजुर्ग होने के नाते आते हैं और राम को शक्ति की आराधना करने के लिए प्रेरित करते हैं । राम देवी की पूजा अर्चना के लीए 108 नीलकमल देवी को अर्पण करने की कामना करते हैं । हनुमान उनके लिए 108 नीलकमलो की व्वस्था करते हैं । तभी देवी चुपके से आकर एक पुष्प चुरा लेती हैं । राम की पूजा अधूरी रह जाती है वो व्याकुल हो जाते हैं  । तब उन्हें याद आता है माँ उन्हें राजीवनयन कहती थी और उनकी आँखों कओ नीलकमल । ये याद आते ही प्रभु अपनी एक आँख निकाल कर देवी को अर्पण करने कि चेस्टा करते हैं और बाण उठा करने आगे बढ़ते हैं । ये देख देवी वहां प्रकट हो जाती हैं और राम को रोक लेती हैं।  फिर राम की भक्ति देख देवी राम में समाहित हो जाती हैं । अगर इसे आधुनिक युग के अनुसार देखे तो पाऐंगे ठीक उसी प्रकार जैसे आज के इस आधुनिक युग में बार बार प्रयाश करने पर भी हम जब असफल हो जाते हैं तो निराशा के चंगुल में फस जातें हैं , हमें लगता है जैसे हमारे पास पैसे या ताकत नहीं है और इस वजह से हम अपने परिस्थितियों से जीत नही सकते । तब हमारे करीबी दोस्त हमें धिक्कारते हैं और हमें अपने मंजिल की और आगे बढ़ने का बिन माँगा सुझाव भी देते हैं । तब जामवंत सा कोई बुजुर्ग हमें अपने फैसलो और हमारे कर्मो का विश्लेषण का शुझाव दे कर हमें आलिंगन करता है । हमारे जीवन में जामवंत कोई भी हो सकता चाहे वो शिक्षक हो , माता पिता , पडोसी , भाई , बहिन , दोस्त यार और कोई भी ... जामवंत को सारथि मान हम अर्जुन के भाँती और आगे बढ़ते हैं शक्ति के स्वरूप में समय और सद्बुद्धि कि पूजा अर्चना करते हैं । शक्ति हमारे दृढ़ संकल्प की दृढ़ता कि परीक्षा भी लेती हैं । कड़ी मेहनत और खाटी चाह रखने वालो से ही देवी प्रशन्न होती हैं और यहि लोग देवी कि परीक्षा में उत्तरीरण भी होते हैं और न केवल वो मंजिल को पाते हैं बल्कि मंजिल की राहो को भी भरपूर रूप से आनंदपूर्वक अनुराग सहित अनुभव भी करते हैं

इस नाटक में राम को एक स्त्री कलाकार के माध्यम से दिखाना अति मनमोहक था । महिलाओ की इस्थिति देख इस नाटक को देख कर मानो ऐसा लग रहा था मानो शक्ति खुद शक्ति को खुदसे दूर पा रही हो । बाल हनुमान ने मेरा मन मोह लिया था ।

पेश हैं कुछ तस्वीरे ।

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